“गुरु की महिमा अपरंपार”

“गुरु की महिमा अपरंपार”

हेलो दोस्तो………जैसा की हम जानते हैं कि कोरोना महामारी के कारण आजकल सारे बच्चे घर पे ही हैं और ऑनलाइन पढ़ाई कर रहे हैं इसके लिए सभी टीचर्स का धन्यवाद है जो ऑनलाइन रहकर बच्चों का मार्गदर्शन कर रहे हैं। सभी टीचर्स को “टीचर्स डे” की बहुत बहुत शुभकामनाएँ। इस अवसर पर मैं एक कहानी लिख रही हूँ जो बताती है कि किस तरह शहर में रहने वाले टीचर ने गाँव के बच्चों की जिंदगी बदल डाली। आशा करती हूँ कि आपको ये पोस्ट पसंद आएगी।

एक बार की बात है, शहरों से बहुत  दूर एक गाँव था। बड़ी बड़ी पहाड़ियों के बीच बसा वह ऐसा गाँव था जहाँ तक पहुँचने के लिए लोगों को कोसों तक पैदल चलना पड़ता था। उस गाँव के लोगों के पास कोई विशेष सुविधा उपलब्ध नहीं थी।"गुरु की महिमा अपरंपार"

विशेषकर वहाँ के बच्चों के लिए पढ़ने के लिए स्कूल की सुविधा भी नहीं थी। उस गाँव में बहुत सारे बच्चे थे जिनको पढ़ने के लिए दूर-दूर के स्कूल में जाना पड़ता था। कुछ ही बच्चे ऐसे थे जो वहाँ तक जा पाते थे। बच्चों की पढ़ने की इच्छा होने के बावजूद भी वो स्कूल नहीं जा पा रहे थे। उस गाँव में ऐसा कोई नहीं था, जो बच्चों की इस समस्या का समाधान कर सकता। परन्तु …..इस दुनिया में अगर समस्याऐं हैं, तो ईश्वर उनका समाधान भी करता है। (“गुरु की महिमा अपरंपार” )

उस गाँव से बहुत बहुत दूर एक शहर था। जहाँ रहने वाले लोग शायद ये कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि गाँवों में रहने वाले लोग बिना किसी सुविधाओं के कैसे अपना जीवन यापन करते हैं। उसी शहर में एक प्रसिद्ध स्कूल था। उस स्कूल के विज्ञान विषय पढ़ाने वाले एक टीचर थे। उनको सब प्रताप सर के नाम से जानते थे। वह उतने ही प्रसिद्ध थे जितना की वो स्कूल प्रसिद्ध था। सारे बच्चे उनसे पढ़ने के लिए उत्सुक रहते थे। टीचर को भी इस बात से बड़ी ख़ुशी मिलती कि बच्चे उनको पसंद करते हैं। एक अच्छे शहर में, एक अच्छे स्कूल में, और अपनों के बीच उनकी जिंदगी भी बहुत अच्छे से गुजर रही थी परन्तु उनको भी इसका अनुमान नहीं था कि जल्दी ही उनके कंधों पर एक बड़ी जिम्मेदारी आने वाली है।

एक दिन एक सरकारी योजना का ऐलान हुआ जिसके लिए दूर दूर के गाँवों में जाकर जानकारियाँ एकत्रित करनी थी। इसके लिए शहर के कई स्कूलों के टीचर्स की ड्यूटी लगाई गई। इत्तेफाक से प्रताप सर की ड्यूटी उसी गाँव में लग गई। प्रताप सर की गाँव जाने की बिलकुल इच्छा नहीं थी लेकिन आर्डर तो मानना ही था। इसीलिए प्रताप सर ने सोचा कि जितनी जल्दी हो वह काम करके गाँव से वापस चले जायेंगे। इसी सोच के साथ वह अगले दिन उसी गाँव में जाने के लिए निकल पड़े। किसी तरह से पैदल चल-चलकर सर जी रात होते होते गाँव में पहुँच तो गए पर हालत बहुत ख़राब थी। गाँव वालों को जब पता चला तो सब लोग उनके स्वागत के लिए आ गए। खाने पीने की व आराम करने की व्यवस्था की गई।  सर जी ने सारे गाँव वालों को सुबह दस बजे एकत्रित होने के लिए कहा।

Mahatma Gandhi Essay

अगली सुबह सभी लोग दस बजे एक जगह पर जमा हो गए। सर जी ने सभी लोगों की जानकारियाँ लेने शुरू कर दी। काम बहुत धीरे धीरे हो रहा था, इस डर से कि ज्यादा समय न लगे, उन्होंने बच्चों की मदद लेने की सोची। पर, सर जी पूरी तरह से चौंक गए जब उनको पता चला कि एक या दो बच्चों के अलावा वह पर कोई बच्चा स्कूल नहीं जाता था। कारण पूछने पर पता चला कि उस गाँव के बच्चों के लिए दूर दूर तक कोई स्कूल नहीं था। सर जी बहुत हैरान हुए, तभी एक छोटे से बच्चे ने उनसे पूछ लिया कि  “सर जी ! क्या आप हमको पढ़ाने यहाँ आये है?” सर जी को कुछ समझ नहीं आया कि क्या कहें, पर उनका मन विचलित हो गया था क्योंकि हजारों बच्चों को साइंस पढ़ाने वाले सर जी के सामने आज कई बच्चे खड़े थे जो न लिखना जानते थे और न पढ़ना।

किसी तरह सर जी ने अपना काम पूरा किया, पर अब उनको जाने की जल्दी नहीं थी। अब उनके दिल और दिमाग में इन बच्चों का भविष्य ही घूमता रहता। बहुत सोचने के बाद उन्होनें ये ठान लिया कि वाे इन बच्चों के भविष्य के साथ बुरा नहीं होने देंगे। इसी प्रण के साथ सर जी ने गाँव वालों से वापस आने का, और स्कूल खुलवाने का वादा किया और शहर वापस चले गए।

दी गई जिम्मेदारी से मुक्त होकर अब सर जी का एक ही लक्ष्य था, पर उसके लिए उनको अपने स्कूल से छुट्टी लेनी थी पर उनकी छुट्टी नामंजूर हो गई। तब सर जी ने एक बड़ा फैसला लिया और अपने स्कूल में इस्तीफा दे दिया। सबके बहुत समझने पर भी वो नहीं माने क्योंकि वो अपने वादे के पक्के थे।

इसके बाद सर ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। वो शहर के बड़े बड़े लोगों से मिले। बड़े बड़े नेताओं से मिलते थे और गाँव के समस्या के बारे में चर्चा करते थे। महीनों तक कड़ी दौड़ धूप के बाद उनकी मेहनत रंग लायी ओर अंततः उस गाँव की तरफ सरकर व लोगों का ध्यान खींचने में सर जी सफल हो गए। और वह दिन भी आ गया जब गाँव में स्कूल बनने का काम शुरू हो गया। सारे गाँव वाले, मुख्यतः बच्चे बहुत खुश थे। और बच्चों को खुश देखकर सर जी भी बहुत खुश थे। गाँव वालों के लिए सर जी आज किसी भगवान से कम नहीं थे। 

उस गाँव की किस्मत बदल चुकी थी। क्योंकि जिस गाँव में केवल स्कूल के लिए सर जी ने इतनी मेहनत करी थी आज उस गाँव में स्कूल के साथ साथ सड़कें, स्वास्थ्य व अन्य सुविधाएं भी आ रहीं थी। सर जी की लगन से स्कूल बनकर तैयार हो गया। सर जी भी ये तय कर चुके थे कि अब उनका पूरा जीवन इस गाँव के बच्चों के लिए ही समर्पित रहेगा इसीलिए उन्होंने अकेले ही बच्चों को पढ़ाना  शुरू कर दिया। क्योंकि प्रताप सर के विषय में शहर में खूब चर्चा हो रही थी तो उनसे प्रभावित होकर कई युवक भी उनका साथ देने उस गाँव में आ गए। अब उस गाँव के हालत बिलकुल बदल चुके थे।

सर जी व अन्य शिक्षकों की मेहनत रंग लायी और उस गाँव के बच्चों ने खूब मन लगा कर पढ़ाई करी और आज उसी गाँव के बच्चे देश और विदेश में जाकर देश का और अपने गाँव का नाम रोशन का रहे हैं। ये सब संभव हो पाया केवल सर जी के त्याग और कड़ी मेहनत से।

धन्य हैं ऐसे शिक्षक जिनका पहला उद्देश्य होता है अपने विद्यार्थियों के भविष्य को उज्जवल बनाना। ऐसे शिक्षकों को तहे दिल से सत् सत् नमन।

thanks for reading this story”गुरु की महिमा अपरंपार”

“TWO BROTHERS AND SPIDER WEB”

“Effect of the good company”

4 thoughts on ““गुरु की महिमा अपरंपार”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *